Friday, November 3, 2017

बुआ का तालाब और गुम्बद , झज्जर bua ka talab and group of tombs , jhajjar , haryana



सन् 1631 में जब मुमताज की मौत हुई तो गमगीन शाहजहाँ नें ताजमहल बनवा दिया । लेकिन उसी काल में 1635 को हरियाणा के झज्जर में भी एक प्रेम कहानी परवान चढ़ी ,जो कुछ ही समय में दम तोड़ गई । यहाँ किसी प्रेमी ने नहीं बल्कि प्रेमिका नें अपने प्रेमी की याद में इमारत बनवाई । हम बात कर रहे हैं बुआ - हसन के प्रेम प्रसंग की । हुआ यूँ कि किसी शाम को मुस्तफा की बेटी बुआ घोड़े पर बैठ कर सैर पर निकली थी । जंगल में बुआ पर किसी शेर ने हमला कर दिया । बुआ चीखने लगी , जिसे सुनकर पास ही लकड़ियाँ काट रहे एक लकड़हारे हसन नें सुना और आकर बुआ की मदद की और शेर को मार गिराया ।  घायल बुआ को हसन तालाब के पास ले गया । जब बुआ को होश आया तो उसने हसन को देखा और  ठीक फिल्मों की तरह इस घटना में बुआ की जान तो बच गई लेकिन दिल हसन को दे बैठी । जब मुस्तफा को ये शेर के हमले वाली बात पता चली तो उसने हसन से कहा कि माँग लो क्या चाहते हो ! हसन नें बुआ का हाथ माँग लिया । मुस्तफा मान जाता है और कुछ समय बाद शादी की बात कहता है  । परंतु शादी से पहले ही हसन को बुलाया जाता है और राजा की ओर से सेना में भर्ती करके युद्ध पर भेज दिया जाता है । युद्ध में हसन मारा जाता है । ये बात सुनकर बुआ को बड़ा सदमा लगता है और वो अपने प्रेमी के शरीर को वहीं उसी तालाब के पास दफनाती है जहाँ वो अक्सर मिला करते थे । ये तालाब अब बुआ हसन तालाब के नाम से जाना जाता है और इसके साथ ही कलालों के मकबरों का समूह है ।

मकबरे


             झज्जर हमारे गाँव हसनगढ़ से करीब तीस किमी दूर है । मुझे कुछ दिन पहले वहाँ से कुछ सामान लाना था तो सोचा इस बार चलो बुआ के तालाब और मकबरे भी देख आते हैं । साथ में दोस्त सचिन और उमेद भी चलने के लिए राजी हो गए । तो बस फिर पहुँच गए झज्जर  । गूगल मैप ने ले जा पटका वही  पर ।
             वहाँ पहुँचे तो नजारा अपेक्षाकृत बेहतर था ।  मकबरों के आस पास पार्क बना दिया गया है । बीच में पक्का पैदल पथ भी । लेकिन वहाँ देखने वाले बस हम तीनों ही थे सिवाय वहाँ काम कर रह मजदूरों के । कुछ देर वहाँ कुछ प्रेम पंछी जरूर आ गए थे । इन जैसे प्रेम पंछियों नें इन स्मारकों का बुरा हाल कर रखा है । जगह जगह नाम लिखे गए है , फलाणा लव्स ढ़िकड़ी । फिलहाल सरकार के द्वारा यहाँ ध्यान तो दिया गया है लेकिन कहीं भी इनके बारे में जानकारी देता कोई पत्थर , बोर्ड नहीं लगा है ।
             झज्जर के बारे में -
             झज्जर शहर हरियाणा राज्य के झज्जर जिले का मुख्यालय है जो दिल्ली से करीब पैंसठ किमी दूर है । झज्जर रेल और सड़क मार्गों द्वारा सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है । झज्जर में बुआ के गुम्बद के अलावा संग्रहालय , बेरी वाली माता का मंदिर , भिंडावास पक्षी अभ्यारण देखने योग्य है ।
         
             अब इन स्मारकों के बारे में कोई और जानकारी मेरे पास नहीं है तो चलिए फोटो ही देख लें .



























Friday, March 24, 2017

खजुराहो , मध्य प्रदेश ( khajuraho , madhya pradesh -1 )



खजुराहो केवल भारत ही नहीं पूरे विश्व में विख्यात है । अपने बेहतरीन कारीगरी शिल्प स्थापत्य की वजह से कम और मंदिरों पर उकेरी गई मिथुन प्रतिमाओं की वजह से ज्यादा । परंतु खजुराहो के मंदिरों पर दर्शाई गई इन मूर्तियों में कहीं भी अश्लीलता नहीं झलकती । ये मंदिर और इन पर उकेरी गई ये कामुक मूर्तियाँ भारतीय स्थापत्य और कला की अमूल्य धरोहर है । बहुत से विदेशी सैलानी भारत आते हैं ताजमहल देखने और उसके बाद नं० होता है खजुराहो का । इसीलिए खजुराहो को विश्व धरोहरों में शामिल किया गया है । यहाँ बने सभी मंदिर अलग अलग समय के बने हुए हैं पर निर्माण शैली एक जैसी ही है । दिसम्बर में मुझे भी यहाँ जाने का मौका मिला । मुझे ओरछा जाना था जहाँ कई राज्यों के घुमक्कड़ों का मिलन होना था । ओरछा मिलन के बारे में आप यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं । मैं पहले खजुराहो जा रहा था और फिर अगले दिन ओरछा । तो 22 दिसंबर को मैं पहुँच गया हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर । मेरा आरक्षण यूपी संपर्क क्रांति में था । गाड़ी सही समय पर आई और मैने अपवी सीट पकड़ ली । कुछ समय बाद एक भाई सहाब आए और बोले -
-आप अपनी सीट हमारी औरत को दो और ऊपर वाली सीट पर जाओ ।
-कहाँ है तेरी औरत ?
-वो रही !
-बीमार है ?
-ना !
-लंगड़ी है ?
-ना ।
-तो क्यूँ जाऊँ ऊपर ? भली चंगी है जवान है ऊपर चढ़ सकती है । इस साईड लोअर के चक्कर में तो इतने दिन पहले बुक कराता हूँ । अब तुझे देदूँ ?

फिर वो नहीं बोला । गाड़ी ने हॉरन मार दिया और चल पड़ी । रात हो चुकी थी । आस पास वाले खाना खाने लगे थे तो मुझे भी भूख लग आई तो घर से साथ लाए परांठे मरोड़ दिए ठंडे के साथ । कुछ बच गए तो वो सुबह के लिए रख लिए सर्दी का मौसम है कोई खराब तो होंगे नहीं सुबह तक । क्षुधा शांत करके कम्बल तान लेट गया । रात को झांसी से एक अंग्रेज चढ़ा । उसके कूपे में एक लड़की अंग्रेजी जबान जानती थी तो उससे तेज तेज अवाज में बातें कर रहा था । मैं मुँह ढंक कर सो गया । सुबह उठा महोबा पहुँच कर । वो लड़की महोबा उतर गई । अंग्रेज सबसे पूछता फिर रहा कि आप अंग्रेजी बोलते हैं । मेरे से पूछा तो मैं बोला कि नहीं बोलता । वो बोला की नहीं आप बोल लेते हैं । मैने कहा कि मेरी अंग्रेजी ऐसी है कि जैसे आप अंग्रेजी की बेईज्जती कर रहे हों । वो बोला की चलेगी । बस फिर बार बार पूछता रहा खजुराहो कब आएगा ? खजुराहो कब आएगा ? जब कई बार उसने दिमाग की दही बनाई तो उससे कहा कि लास्ट बार बता रहा हूँ ये ट्रेन खजुराहो तक ही जाएगी अब मत पूछना । मैं उतरूँ तो साथ उतर लेना । तब उसने पीछा छोड़ा और मैंने कामना की कि भगवान फिर कभी अंग्रेजी ना बोलनी पड़े । महोबा में 12447 यूपी सम्पर्क क्रांति जो निजामुद्दीन से चलती है यूपी में मानिकपुर तक जाती है । महोबा में इसके आधे डब्बे कटकर खजुराहो की तरफ हो लेते हैं । महोबा से खजुराहो तक ट्रेन का नं० हो जाता है 22447 । जबकी आगे वाले आधे डब्बे  12447 नं० से मानिकपुर चले जाते हैं ।

महोबा 

चल पड़े खजुराहो की ओर 

सुबह हुयी ही है 

जब हमारी गाड़ी महोबा से खजुराहो के लिए चली तो तीन चार लड़के हमारे डब्बे में आकर बैठ गए । एक सारे डब्बे को देखकर आया और किसी के पास फोन मिलाया और कहा कि एक अंग्रेज अकेला है और एक जोड़ा है , मालदार लग रहे हैं । मुझे लगा कहीं ये चोर वगैरह ना हों । मैने वैसे ही पूछ लिया कि क्यों भाई लूटने का ईरादा है क्या ? उनमें से एक ने हँसकर कहा कि नहीं भाई । हमारा एक दोस्त वहाँ ऑटो चलाता है । अंग्रेज लोग पैसा ज्यादा दे देते हैं ना । आठ नो बजे ट्रेन खजुराहो पहुँच गई । महोबा से खजुराहो के बीच ट्रेन कहीं नहीं रूकी । खजुराहो का प्लेटफॉर्म बढ़िया बना हैं । स्टेशन को भी मंदिरों की तरह ही रूप दिया गया है । मैं स्टेशन से बाहर निकला तो देखा कि ऑटो वालों का जमावड़ा सा लगा है । स्टेशन शहर से सात आठ  किमी दूर है । अब ऑटो वालों को भी पता है कि जिकनी सवारी ट्रेन में आनी है वो सब जाऐंगे शहर तो भीड़ भी ऑटो वालो पर टूट पड़ी । दड़ादड़ ऑटो भर भर के चलने लगे । ये जल्दबाजी का काम मेरे बस का नहीं है । मैं जाकर साईड में बैठ गया  और भीड़ कम होने का इंतजार करने लगा ।


स्टेशन मंदिर की तरह ही बनाया है 

 कुछ ही देर में भीड़ खत्म !  एक खाली ऑटो आया तो ड्राईवर बोला -

- खजुराहो चलना है भाईसाब ?
- हाँ चलना है ।
- बैठो ।
- बैठने से पहले बता कि पैसे कितने लेगा ?
- जितने सब देते हैं !
- अपने मुँह से बोल कर बता कितने । क्या पता तू तो जाकर कह देगा दौ सौ दो स्पेशल लाया हूँ ।
- नहीं भाईसाब । दस रूपए ही लूंगा ।

ये बाते मैने की किसलिए ? भोपाल में जब सचिन भाई और कौशिक जी के साथ गया था तो ये पहले पैसे ना पूछना महंगा पड़ा था । तब से आदत बदल ली है ।
कुछ ही देर में खजुराहो में था । बसअड्डे के पास मैने कहा कि भाई बस यहीं उतार दे । बस अड्डे में गया कुछ चाय शाय के चक्कर में । दो बस खड़ी थी प्राईवेट ट्रांसपोर्ट । सरकारी बस तो वहाँ चलती ही नहीं । चाय बनवायी ( बिना रेट पूछे ) । चाय के साथ बचे परांठे खाए ( दो खाए , दो कुत्तों को खिलाए ) । चाय पीकर चाय वाले को दस रूपये पकड़ा चलने लगा तो उसने आवाज दी । मैने सोचा की भाई ये तो गोल्डन चाय बोलकर और रूपये तो नहीं माँगेगा । पर ये क्या ? बंदा मुझे ही पाँच रूपये लौटा रहा है । नहीं लगा था कि टूरिस्ट प्लेस और वर्ल्ड फेमस ! इतना सस्ता होगा । उसी चाय वाले से पूछा -

- ताऊ मंदिर कौणसी तरफ है ?
- हरियाणा से आए हो ?
- हाँ !
- उस तरफ निकल जाओ कुछ आगे चलकर है ।

अब देखिए ना लोग हमारी हिंदी सुनकर भी उसमें से हरियाणवी सूँघ लेते है । चलो ठीक ही है ( आई प्राउड टू बींग ए हरियाणवी ) । मैं मंदिरों की तरफ चल निकला । परांठों वाली पोलीथीन एलुमिनियम फॉईल फेंकना चाहता था पर सफाई ज्यादा थी वहाँ फेंक ना पाया । तो डस्टबीन ढूँढा और उसमें डाला कूड़ा । अब सीधा चल पड़ा मंदिरों की ओर । मंदिरों का पश्चिमी समूह एक जगह ही है । इनका रखरखाव भी बढ़िया है और चारों तरफ बागड़ बनाई गई है । पूरी जगह में घास - फूल लगाए गए हैं । इस समूह को देखने के लिए टिकट लगती है शायद तीस रूपए की थी । मैं टिकट लेकर घुस गया । ज्यादा भीड़ नहीं थी बस दस पंद्रह लोग और आए थे । सबसे पहले पहुँचा लक्ष्मण मंदिर के सामने बने लक्ष्मी मंदिर और वराह मंदिर में । ये दोनो ही आकार में बाकी मंदिरों सें छोटे हैं ।  वराह मंदिर में भगवान विष्णु की वराह रूप में काफी उँची प्रतिमा है । पूरे शरीर पर देवी देवताओं की छोटी छोटी मूर्तियाँ उकेरी गई हैं । थूथन पर लक्ष्मी की मूर्ति बनी है , पैरों के नीचे शेषनाग की प्रतिमा खंडित अवस्था में है । वराह मंदिर में गृभगृह बंद नहीं है ! दीवारों की जगह बारह स्तंभ बनाए गए हैं । वराह की मूर्ति बार बार छुए जाने के कारण बिल्कुल ही चिकनी हो चुकी है । ये मूर्ति भी खजुराहो में मेरे मुख्य आकर्षणों में से एक थी । यहाँ से मैं बढ़ा लक्षमण मंदिर की तरफ ।







लक्षमण मंदिर का निर्माण 930 से 950 ई० के मध्य में चंदेल राजा यशोवर्मन द्वारा कराया गया । राजा यशोवर्मन का एक और नाम लक्षवर्मा था । ये मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है पर राजा यशोवर्मन के नाम लक्षवर्मा के कारण इस मंदिर का नाम लक्ष्मण मंदिर पड़ा । ऊँचे चबूतरे पे बना ये मंदिर काफी विशाल है  और जैसा इसके बाहर लगे शिलालेख से पता चलता है ये शिल्प की दृष्टि से भी ये सर्वोत्कृष्ठ है । उंचे चबूतरे पर बने इस मंदिर के चारों ओर चबूतरे के कोनों पर चार छोटे मंदिर भी बनाए गए हैं । इस मंदिर में अर्धमंडप फिर मंडप  उसके बाद महामंडप और फिर गृभगृह है । गृभगृह में भगवान विष्णु की तीनमुखी और चतुर्भुजी प्रतिमा है ( हाँलांकी चारो हाथों को मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा खंडित किया गया है ) ।  मंदिर के अंदर एक समतल फर्श नहीं है । अर्धमंडप , मंडप तक ऊँचा फिर महामंडप में डेढ़ दो फुट गहरा । फिर गृभगृह में प्रवेश के लिए तीन चार फुट उँची  सीढ़ियाँ पर दरवाजा और फिर गृभगृह भी मंहामंडप की ही तरह गहरा । अंदर भी सारा मंदिर मूर्तियों से सुसज्जित है कोई भी दीवार खाली नहीं है । और बाहर तो कुछ इंच भी खाली नहीं छोड़ा गया है । अंदर कुछ तस्वीरें लेकर मैं बाहर आ गया । बाहर आया तो नजरें उन जानी पहचानी मूर्तियों को ढूँढने लगी जिनकी खजुराहो के नाम से  तस्वीरें भरी पड़ी है अन्तर्जाल पर । जब तक वे मिथुन मूर्तियाँ मुझे नहीं दिखी तब तक किसी और मूर्ति पर मेरा ध्यान नहीं गया । जब तक इन्हे साक्षात नहीं देखते तब तक सुनने में तस्वीरें देखने में अजीब लगता है कि ऐसी ऐसी मूर्तियाँ ? पर जब आप स्वयं इन्हे देखते हैं तो यकीन मानिये रत्ती भर भी अश्लीलता इनमें नजर नहीं आती । जब भी खजुराहो का जिक्र होता है सिर्फ इन्ही की बात होती है जबकी मंदिरों पर इनकी अपेक्षा दूसरी जैसे गंधर्व अप्सरा , सैनिक , भगवानों की मूर्तियाँ बहुत अधिक है । हर एक मूर्ति इतनी सुंदर है लगता है मानों अभी सजीव हो उठेंगी । मैं इन्हें ही देख रहा था की दूसरी तरफ कोई गाईड बता रहा था देखिए उस मूर्ती को ! वो औरत नहा रही है वस्त्र शरीर पर चिपक गया है और वो दूसरी औरत उसे दूरबीन से देख रही है । मैं कुछ देर बाद उधर गया तो उसी मूर्ति को ढूंढने लगा । कोने पे मुझे वो दिखाई दी स्नान करती महिला और दूसरी महिला उसे दूरबीन से देख रही थी ।  हर एक मूर्ती मानों एक कहानी कह रही हो । चबूतरे के चारों और भी छोटी छोटी मूर्तियाँ दिवार पर बनी है । जैसे हाथी घोड़ों पर सवार सैनिक जा रहे हैं । एक अन्य में एक मोटा सा धनवान व्यक्ति जा रहा है सेवक उसे उठाए हैं । उसके साथ महिलाएँ भी चल रही है महिलाओं के आगे ढोल वाले चल रहे हैं । और इसी पट्टी पर एक और बनी थी कुछ मिथुन प्रतिमाएँ जो कि बिल्कुल अलग थी । पशु - मैथुन भी यहाँ दर्शाया गया है जो बाकी प्रतिमाओं में नजर नहीं आता है या शायद दूसरे किसी मंदिर पर भी नहीं था । लक्ष्मण मंदिर में कुछ समय बिताने के बाद मैं चल पड़ा कंदारिया महादेव मंदिर की तरफ । पर आगे की कहानी आगे की पोस्ट में ।

लक्ष्मण मंदिर 

लक्ष्मण मंदिर 

मैं 

गणेश जी 

ये लक्ष्मी जी 

ये मुझे पक्का नहीं पता पर शायद ब्रह्मा जी हैं 

वराह अवतार 

ये शायद विष्णु जी 

ये रही वो गीले वस्त्रों वाली महिला और उसे दूरबीन से देखती महिला 





कुछ तुम कहो कुछ हम कहें 


ये अंदर से खोखली है शायद ये पानी की निकासी के लिए होगी 

लक्ष्मण मंदिर के सामने लक्ष्मी मंदिर