Tuesday, January 16, 2018

रानी की बावड़ी , नीमराणा ,राजस्थान ( neemrana bawdi , rajsthan )

नितीश और मैं रेवाड़ी से पहले 

दिल्ली से करीब 120 किमी दूर दिल्ली जयपुर हाईवे पर पड़ता है । आजकल इस ऐतिहासिक शहर को इसके इतिहास की बजाय यहाँ बने औद्योगिक क्षेत्र के कारण ज्यादा जाना जाता है । सन् 1470 के दशक  में चौहानों ने अपनी राजधानी यहाँ स्थानांतरित की थी । यहाँ नीमराणा में जो किला है वो भी उसी काल का है । पर हमारा यहाँ जाने का कारण ओद्योगिक क्षेत्र या नीमराणा किला नहीं था बल्कि हम यहाँ आए थे रानी की बावड़ी देखने । अठारवीं सदी में बनी ये बावड़ी ही हमें हमारे घर से 130 किमी दूर खींच लाई थी । यहाँ आने से पहले हमारे कई रविवार निकल गए पर कुछ ना कुछ अटक जाता था । पर इस बार हमने ठान ली थी कि जाना है और जरूर जाना है । मैं तैयार था और संदीप भी । नितीश को बोला तो वो भी तैयार । अब ये बड़ी नाइंसाफी हो गई की वाहन दो सवारी तीन तो कई और मित्रों से पूछा परंतु कोई राजी नहीं ।
 हमें जाना तो था ही तो हम तीनों सुबह नहा धोकर तैयार । मैने और संदीप ने पल्सर ले ली और नितीश अपनी एक्टिवा से चल रहा था । अब ज्यादा दूरी तो थी नहीं और अपने हरियाणा के रोड़ है मस्त तो जल्दी ही रेवाड़ी पहुँच गए । अब रेवाड़ी से हमें दिल्ली - जयपुर हाईवे पकड़ना है । रेवाड़ी में बाईक में तेल डलवाकर और अपने अंदर पानी डालकर हम नीमराणा की तरफ कूच कर गए ।
राजस्थान सीमा प्रारंभ 


 नीमराणा से कुछ पहले टोल है । वहाँ से पहाड़ियाँ दिखाई देनी शुरू हो गई । नीमराणा हाईवे से दो तीन किमी अंदर है । जब हम नीमराणा के पास पहुंचते हैं तो वहां पर है नीमराना का इंडस्ट्रियल एरिया है । नीमराना शहर के सामने हाईवे का अंडरपास है जब हम पुल के नीचे पहुंचे तो वहां पर रुक कर हमने वहां लगी रहडियो पर पहले अपना पेट भरा ₹30 की थाली से जिसमें दो पराठे और आलू की सब्जी मिली ।
 हमको सबसे महत्वपूर्ण काम यही लगता है की पहले पेट पूजा बाकी फिर काम दूजा क्योंकि भरे हुए पेट से ही आदमी को दुनिया खूबसूरत लगती है खाली पेट तो दुनिया भी ऐसे ही खाली खाली लगती है अब यहां पेट पूजा करने के बाद हम निकल पड़े नीमराना शहर की ओर । नीमराना शहर कोई ज्यादा बड़ा शहर नहीं है । शहर के बीच से एक रास्ता नीमराना किले की ओर जाता है हमने तय किया कि पहले हम नीमराना बावड़ी की तरफ जाएंगे और आते हुए हम यहां किले की ओर भी चले जाएंगे । तो गूगल मैप की सहायता से हम शहर को पार करके नीमराना बावड़ी तक पहुंच गए जब हम नीमराना बावड़ी पहुंचे तो एक बार तो बावड़ी की हालत देखकर हमारा मन टूट गया बावड़ी बहुत ही खस्ता हालत में थी । इतिहास की आंखों की वह चमक आज आंसू बनकर गिरने ही वाली है । इतिहास की इस अनुपम धरोहर का आज कोई रखवाला नहीं है , ना तो सरकार और ना ही नीमराना के निवासी । बावड़ी एक किस्म का कूड़ेदान बनी हुई थी देख कर मन विचलित हो गया ।


 ना तो यहां साफ-सफाई थी और ना ही कोई सूचना प्रदान करने वाला बोर्ड ही लगा था । हां ! कुछ बकरियों वाले बावड़ी के अंदर अपनी बकरियों को जरुर चरा रहे थे जब हम वहां गए तो वहां पर उस समय तक कोई नहीं आया था ।

बकरियों का रमला ठमला है यहाँ 
बाहर से दिखती बावड़ी 


 अब वहां पर इन सीढियों के बारे में कोई सूचना तो थी नहीं , तो हमने नीचे उतरते वक्त इन्हें गिनना शुरू कर दिया । कुल मिलाकर 183 सीढ़ियां थी । अगर एक सीढी की चौड़ाई हम डेढ़ फुट मानकर चलें तो यह ढाई सौ फीट से भी लंबी बावड़ी बनती है और गहराई भी इसकी बहुत ही ज्यादा है यह बावड़ी अलग-अलग मंजिलों में बनी है कुल मिलाकर 9 मंजिले हैं । इसकी गहराई का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि जब हम तल पर खड़े थे तो वहां पर सूरज की रोशनी कम जाती है  । जब हम तल में बने रस्ते से कुए के नीचे पहुंचे तो अंदर बहुत ही कम रोशनी थी कुआं बहुत ही गहरा है । कुछ देर वहां रहने के बाद वहां पर कुछ और पर्यटक भी आ गए तब हमें लगा कि चलो आज भी कोई तो इसका देखने वाला है । हम अकेले नहीं हैं । घूमने आए पर्यटकों में से एक वृद्ध जोड़ा वहां उतर तो गया पर चढ़ने में उनको बहुत ही मुश्किल हुई। बार-बार रुक रुक कर बैठ बैठ कर बहुत ही मुश्किल से वह वापस बावड़ी से बाहर आए इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि बावड़ी कितनी गहरी है । जब हम करीब पांचवी मंजिल पर थे तो जो छज्जे वहां से बाहर निकले हैं नीतीश तो वहां से निकल गया पर गहराई देखकर मेरी वहां जाने की हिम्मत नहीं हुई । कम से कम 50 या 60 फुट की गहराई और पकड़ने के लिए कुछ भी नहीं । अब डर तो लगेगा ही ! तो मैंने छज्जे पर जाना कैंसिल कर दिया । अब हिम्मत डर के आगे जवाब दे गई थी लेकिन एक मंजिल और ऊपर जाने के बाद फिर से हिम्मत बंध गई नीतीश और संदीप के बार बार कहने के बाद आखिरकार बिना नीचे देखे मैं भी छज्जा पार कर ही गया । वहां पर काफी समय गुजारने के बाद हम वहां से निकल चले ।

नीचे से ये नज़ारा दीखता है 

कुए के तल से ज़ूम करके लिया गया चित्र 

कुए के तल से बगैर ज़ूम किये 

 अब हमें किले की तरफ जाना था । मुझे पहले से ही जानकारी थी कि यहां पर बहुत ज्यादा महंगाई है किले में इंट्री फीस ही बहुत ज्यादा है । हम इसलिए गए थे कि बाहर से तो देख ही सकते हैं । यह किला 15 वी शताब्दी में बनाया गया था जब चौहानों ने अपनी राजधानी यहां बसाई थी । दो-तीन साल पहले यहां पर इंट्री फीस बहुत ही कम थी पर पिछले साल यह 1500 कर दी गई थी जैसी मुझे जानकारी थी । संदीप ने पूछा तो इस साल यह बढ़ाकर ₹2000 कर दी है । अब इतना तो हमारा तीनों का यहां आने जाने का खर्चा भी नहीं है तो ₹2000 यहां जाने के लिए देना हमारे लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है तो हम बाहर से देख कर ही वापस चल पड़े । अब यहां और कुछ हमारे देखने लायक तो था नहीं इसलिए वहां से गोलगप्पे खाकर हम सीधे घर के लिए निकल पड़े ।

बावड़ी से दूर दिखाई देता किला 

 बावड़ी की हालत पर हमें इतना बुरा नहीं लगा जितना इस बात से लगा कि उसे सुधारने के लिए कोई प्रयास नहीं किया जा रहा । किले की दिशा रास्ता बताने के लिए बहुत से बोर्ड लगे हैं जबकि बावड़ी के लिए एक भी नहीं । यहाँ बावड़ी बहुत ही उपेक्षित हालत में है और इसके लिए नीमराना वासी भी कुछ हद तक जिम्मेदार हैं । राजस्थान में इतिहास भरा पड़ा है और इस इतिहास में किलो के साथ-साथ बावड़ियों का भी बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है । आशा है कि प्रशासन आने वाले समय में बावड़ी की मरम्मत करवाएगा और इसकी ऐतिहासिक अहमियत समझेगा । अब चलिए पोस्ट खत्म करते हैं और अब कुछ और फोटो देख लीजिए वैसे  किले के फोटो तो कट गए मुझसे तो उसके लिए सॉरी  -






















Friday, November 3, 2017

बुआ का तालाब और गुम्बद , झज्जर bua ka talab and group of tombs , jhajjar , haryana



सन् 1631 में जब मुमताज की मौत हुई तो गमगीन शाहजहाँ नें ताजमहल बनवा दिया । लेकिन उसी काल में 1635 को हरियाणा के झज्जर में भी एक प्रेम कहानी परवान चढ़ी ,जो कुछ ही समय में दम तोड़ गई । यहाँ किसी प्रेमी ने नहीं बल्कि प्रेमिका नें अपने प्रेमी की याद में इमारत बनवाई । हम बात कर रहे हैं बुआ - हसन के प्रेम प्रसंग की । हुआ यूँ कि किसी शाम को मुस्तफा की बेटी बुआ घोड़े पर बैठ कर सैर पर निकली थी । जंगल में बुआ पर किसी शेर ने हमला कर दिया । बुआ चीखने लगी , जिसे सुनकर पास ही लकड़ियाँ काट रहे एक लकड़हारे हसन नें सुना और आकर बुआ की मदद की और शेर को मार गिराया ।  घायल बुआ को हसन तालाब के पास ले गया । जब बुआ को होश आया तो उसने हसन को देखा और  ठीक फिल्मों की तरह इस घटना में बुआ की जान तो बच गई लेकिन दिल हसन को दे बैठी । जब मुस्तफा को ये शेर के हमले वाली बात पता चली तो उसने हसन से कहा कि माँग लो क्या चाहते हो ! हसन नें बुआ का हाथ माँग लिया । मुस्तफा मान जाता है और कुछ समय बाद शादी की बात कहता है  । परंतु शादी से पहले ही हसन को बुलाया जाता है और राजा की ओर से सेना में भर्ती करके युद्ध पर भेज दिया जाता है । युद्ध में हसन मारा जाता है । ये बात सुनकर बुआ को बड़ा सदमा लगता है और वो अपने प्रेमी के शरीर को वहीं उसी तालाब के पास दफनाती है जहाँ वो अक्सर मिला करते थे । ये तालाब अब बुआ हसन तालाब के नाम से जाना जाता है और इसके साथ ही कलालों के मकबरों का समूह है ।

मकबरे


             झज्जर हमारे गाँव हसनगढ़ से करीब तीस किमी दूर है । मुझे कुछ दिन पहले वहाँ से कुछ सामान लाना था तो सोचा इस बार चलो बुआ के तालाब और मकबरे भी देख आते हैं । साथ में दोस्त सचिन और उमेद भी चलने के लिए राजी हो गए । तो बस फिर पहुँच गए झज्जर  । गूगल मैप ने ले जा पटका वही  पर ।
             वहाँ पहुँचे तो नजारा अपेक्षाकृत बेहतर था ।  मकबरों के आस पास पार्क बना दिया गया है । बीच में पक्का पैदल पथ भी । लेकिन वहाँ देखने वाले बस हम तीनों ही थे सिवाय वहाँ काम कर रह मजदूरों के । कुछ देर वहाँ कुछ प्रेम पंछी जरूर आ गए थे । इन जैसे प्रेम पंछियों नें इन स्मारकों का बुरा हाल कर रखा है । जगह जगह नाम लिखे गए है , फलाणा लव्स ढ़िकड़ी । फिलहाल सरकार के द्वारा यहाँ ध्यान तो दिया गया है लेकिन कहीं भी इनके बारे में जानकारी देता कोई पत्थर , बोर्ड नहीं लगा है ।
             झज्जर के बारे में -
             झज्जर शहर हरियाणा राज्य के झज्जर जिले का मुख्यालय है जो दिल्ली से करीब पैंसठ किमी दूर है । झज्जर रेल और सड़क मार्गों द्वारा सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है । झज्जर में बुआ के गुम्बद के अलावा संग्रहालय , बेरी वाली माता का मंदिर , भिंडावास पक्षी अभ्यारण देखने योग्य है ।
         
             अब इन स्मारकों के बारे में कोई और जानकारी मेरे पास नहीं है तो चलिए फोटो ही देख लें .