Sunday, July 27, 2014

हरिद्वार आटो यात्रा : हसनगढ़ से हरिद्वार ( haridwar auto yatra -2 )

प्रस्तुतकर्ता : हरेन्द्र धर्रा 
इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए क्लिक करे |
अगले दिन हमनें तैयारी शुरू कर दी | सबसे पहले एक आटो का इन्तजाम किया गया | तेल और चार सौ रूपये रोज के तय हुए | दोपहर को नितीश को फोन लगाया तो वो बोला उसे छुट्टी मिल गई है , चार पाँच बजे तक आ जाएगा | अब पाँचो का जाना तय था |
                           आटो पीछे से खुल्ला था दिल्ली के आटो की तरह बंद नहीं क्योंकी हरियाणा में चार सवारी पीछे भी तो बैठाते है | हमने आटो की पीछली सीट उतार दी ताकी लेटने का इन्तजाम हो जाए | पीछे मैट दरी डालकर उपर एक गद्दा डाल दिया |
                              व्रत के सीजन में वहाँ खाना ना तो बढ़िया मिलता है और ना ही किफायती | आटो में एक सिलैंडर चूल्हा और बर्तन रख लिए और खाना बनाने का सामान भी रख लिया |
                 शाम को तीर्थ यात्रा का बैनर लगा कर हम निकल पड़े | भोले का बैनर एक तरह के लाईसैंस का काम करता है कही भी कोई रोकटोक नहीं होती | भोले के भक्तो के सामने सब सिस्टम फेल हो जाते हैं |
                  हमारे गांव यानी हसनगढ़ से हरिद्वार की दूरी 205 कि मी है लेकिन जाते वक्त जाम ना लगे और काँवड़ियों की सुरक्षा के मद्देनजर घुमा फिरा के 100 कि मी ज्यादा लम्बाई बढ़ा देते है |
                    सोनीपत के बाद हमें दिल्ली हरिद्वार रोड पर भेज दिया | ये हाईवे सिर्फ काँवड़ियों के लिए खुला था | पूरे रस्ते में काँवड़ियों की भीड़ मिली | कुछ कुछ दूरी पर शिविर लगे थे | इन शिविरों में काफी बढ़िया इन्तजाम थे | हम मेरठ के पास पहुँच कर एक शिविर में डांस देखने लगे कुछ देर बाद खाना खाया | परांठे हम लेकर गए थे सब्जी होटल से ले ली थी |
              पेट पूजा के बाद हम फिर निकल पड़े | घण्टे भर बाद सोने के लिए रूके और कुछ नींद निकाल कर फिर चल दिए |
                 उ• प्र• के रोड भी बड़े अजीब होते है , मान लिजिये हरिद्वार 154 कि मी है आध पौन घन्टा चलने के बाद ये दूरी 165 कि मी भी हो सकती है | 
                   सुबह एक गांव में रूककर चाय पी | फ्रैश होकर आम के बगीचे दिखे | कुछ आम तोड़ कर खाए | वाह ! पेड़ पर पके फल का तो स्वाद ही कुछ और ही होता है |
                  सुबह सात आठ बजे हम हरिद्वार पहुंच चुके थे |
                  बाकी अगली पोस्ट में |
                   फिलहाल कुछ चित्र |
रस्ते में हवा के लिए हम छत पर बैठ गए
सुबह आटो रोककर चाय पी
सूर्यनारायण के दर्शन
जाम का नजारा
रूड़की कुछ कि मी आगे



No comments:

Post a Comment