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Tuesday, February 3, 2015

एन सी सी कैंप ( कुफरी,हिमाचल प्रदेश ) जुलाई 2007

 प्रस्तुतकर्ता : हरेन्द्र धर्रा
   
   ये यात्रा संसमरण तब का है जब मैं नोवीं क्लास में पढ़ता था |मैंने स्कूल में एन सी सी ( राष्ट्रीय कैडेट कोर ) ले रखी थी जिसके तहत दुसरे वर्ष में एक कैंप अटेण्ड करना होता था जो सबके लिए अनिवार्य होता था | ये कैंप दस दिन का होता था | इसमें सभी कैडेट को जाना होता था | लेकिन इसके आलावा एक और कैंप लगता था जिसमे की परेड या प्रक्टिस नहीं करनी होती थी ये सिर्फ पर्यटन के लिए होता था |
           तो इसमें मेरा नम्बर भी पड़ गया | मेरे आलावा मेरे गाँव से तीन लड़के और दो लडकियों को भी जाना था | लडको के नाम थे - गुलाब,कृष्ण,और तीसरे का नाम पक्का याद नहीं , चलिए अपने पास से अनिल रख लेते है | वैसे हमको नहीं पता था की लडकियां भी जा रही है | 29 जून को निकलना था | हमें सुबह सात बजे तक रोहतक एन सी सी ऑफिस में पहुचने को कहा गया था | हम रोहतक पहले कभी बिना किसी बड़े के साथ नहीं गए थे | फिर भी हम समय से पहले रोहतक पहुँच गए |
            पर रोहतक तो पहुँच गए पर ऑफिस कहाँ है ये कोई नहीं जनता था हमें तो हमारे मास्टर ने बस ये कहा था की डी पार्क पर उतर लेना और वहां पूछ लेना | हमने एक से पूछा तो उसने एक गली की तरफ इशारा कर दिया | हम चल दिए गली की तरफ  काफी दूर जाने पर भी कुछ काम का नहीं मिला तो एक से फिर पूछा उसने कहा वो तो साथ वाली गली में था | सत्यानाश ! वापस आकर दूसरी गली में गए तो वहां भी यही हाल हुआ | वापस डी पार्क पर निराश होकर आ गए | एक पर्ची पर मास्टर जी का नंबर लिखवा कर लाए थे तो एक एस.टी.डी. पर जाकर फोन मिलाया तो सर ने पूछा इस वक़्त तुम कहाँ हो ? तो हमने कहा की सर हम तो डी पार्क पर जो गाँधी की मूर्ति लगी है उसके पिछली तरफ जो एस.टी.डी. है उसमे से बात कर रहे है | तो सर ने कहा के एक दुकान छोड़ कर जो गली है उसमे जाओ ! वहां मोड़ पर ऑफिस है |                                तो इस तरह हम ठिकाने पर पहुंचे | हम तो सोच रहे थे की हम लेट है पर वहां तो कुछ ही बच्चे थे | बाद में सर हमारे स्कूल की उन लडकियों को भी ले कर पहुँच गए | तब हमें पता चला के लड़कियां भी जा रहीं हैं | खैर हमने जून के महीने में जर्सी और गर्म बनियान और मोटे मोटे कम्बल इशू करवाए और दोपहर 11 बजे हम बस में बैठ कर रोहतक से चल पड़े |
जब हम रोहतक से चले थे , तब सारे के सारे गर्मी से बेहाल थे | आधे लड़के तो शर्ट निकाल बनियान में ही बैठे थे | मैं और गुलाब दोनों एक सीट पर बैठे थे क्योंकि एक या दो सीट कम पड़ रही थी | इतना लम्बा रस्ता और एक सीट पे दो लोग ! बड़ी नाइंसाफी थी सो दो तीन घंटो बाद मैं उठा और जो ए.एन.ओ. (मास्टर) हमारे साथ जा रहा था उससे शिकायत की, उसने कहा ड्राईवर वाले कैबिन में जा ! मैं जाकर ड्राईवर वाले कैबिन में गया और ड्राईवर से कहा की उस्ताज मैं तो सोऊंगा ! ड्राईवर अ.एन.ओ. को बोला के जी ये बंदा यहाँ काम नहीं देगा | तभी एक सीनियर डिविजन के लड़के ने कहा के भाई तू मेरी सीट पे आजा हम पीछे बैठ के ताश खेलेंगे | भूखा क्या मांगे ? रोटी ! मैं झट से बैठ गया |
                      करनाल पहुँचने के बाद बस रोकी गयी झिलमिल ढाबे पे | बस नाम का ढाबा था , सारी सुविधाएँ थी | बस रुकी तो इतने सारे कस्टमर देख कर ढाबे वाले भी खुश हुए ,लेकिन ये ख़ुशी क्षणिक ही थी पहले सारे बच्चे बाथरूम में घुसे फ्रेश होकर हाथ मुंह धो कर कुछ तो वापस बस में बैठ गए और कुछ पेप्सी वगरह लेके अपने अपने परांठे निकाल खाने लगे | ढाबे वाले का कम से कम एक दो लीटर खून तो जरूर फूंका होगा हमने |
                     बस फिर चल निकली | अब तक अँधेरा हो चुका था , एक ढाबे पर बस फिर रुकी | पर इस वाले की खूब कमाई करवाई  गयी | वो ढाबा ढलान के पास था और थोड़ी दूर से ट्रेन गयी l जिन्दगी में पहली बार कालका शिमला ट्रेन देखी , पर अँधेरे में क्या खाक देखी | रात को रस्ते में एक शहर चमकता दिख रहा था l सीनियर ने बताया ये शिमला है | रात को करीब एक डेढ़ बजे हम कुफरी पहुंचे | जब तक शीशे बंद थे तब तक फरक था लेकिन जब हम नीचे उतरे तो क्या जबरदस्त ठण्ड लग रही थी | ये मेरी पहली पहाड़ी यात्रा थी | जून में सर्दी के एहसास ने रोमांच भर दिया था | एक पेड़ पर पास ही में कुछ लगा था खट्टा खट्टा सा | हम कहने लगे आडू हैं l आडू का नाम सुनकर किसी ने नहीं खाया |  फोजियों ने हमें टेंट दिखा दिए , और हम थके हारे से पड़ते ही सो गए |
शेष वृत्तान्त अगली पोस्ट में | चित्र न होने का खेद है |
क्रमशः -  अगला भाग पढने के लिए क्लिक करे 

4 comments:

  1. Oho to apka apna blog bhi hai ? good Neeraj jaat ki shagirdi karo bahut kuchh sikhne ko milega.. photo to lagani chahiye har blog post mein

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    1. |फोटो कहां से लगाता जी ! कैमरा तो था ही नहीं ! फोन भी हमें तो उसी साल मिला था | वैसे ब्लॉग तो है पर
      पोस्ट तो नहीं है अभी इसलिए गड़े मुर्दे उखाड़ रहा हूं | वैसे एक फोटो है वो अगली पोस्ट में लगाउंगा

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  2. तो पोस्ट बनाओ... उठाओ कैमरो और पंहुच जाओ हिमाचल..

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    1. समय को छोड़ कर सब है l नौकरी पे होता तो छुट्टी ले लेता ,पर खुद से छुट्टी मांगना मुश्किल काम है l

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